चंडीगढ़ हाई कोर्ट का बड़ा स्पष्टिकरण: ‘स्टिल्ट 4 फ्लोर’ आदेश सिर्फ गुरुग्राम तक सीमित

चंडीगढ़ हाई कोर्ट का बड़ा स्पष्टिकरण: ‘स्टिल्ट 4 फ्लोर’ आदेश सिर्फ गुरुग्राम तक सीमित

Chandigarh High Court makes a major clarification:

Chandigarh High Court makes a major clarification

चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने सोमवार को “स्टिल्ट 4 फ्लोर” नीति पर अपने दो अप्रैल के अंतरिम आदेश को लेकर फैली भ्रम की स्थिति को दूर करते हुए साफ कर दिया कि यह रोक केवल गुरुग्राम जिले तक ही सीमित रहेगी।

चीफ जस्टिस शील नागू और जस्टिस संजीव बेरी की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि राज्य के अन्य जिलों में इस आदेश का कोई प्रभाव नहीं होगा और वहां प्रशासन कानून के अनुसार कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र है।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि दो अप्रैल 2026 को पारित अंतरिम आदेश केवल गुरुग्राम के एक विशेष क्षेत्र के निरीक्षण के बाद दिया गया था, इसलिए इसे पूरे हरियाणा या अन्य जिलों पर लागू नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अंतरिम आदेश “हमेशा भविष्य के लिए प्रभावी” होते हैं, यानी पहले से स्वीकृत या निर्मित भवनों पर इसका स्वतः असर नहीं पड़ेगा।


बिना नोटिस के तोड़फोड़ की तैयारी

सुनवाई के दौरान निवासियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने दलील दी कि अदालत के आदेश की आड़ में गुरुग्राम में बिना नोटिस दिए तोड़फोड़ की तैयारी की जा रही है। उन्होंने कहा कि कुछ मामलों में अतिक्रमण हो सकता है।

लेकिन बिना कारण बताओ नोटिस दिए सीधे कार्रवाई करना उचित प्रक्रिया का उल्लंघन है। इस पर अदालत ने कहा कि यदि कहीं अवैध निर्माण या अतिक्रमण है तो संबंधित प्राधिकरण कानून के तहत कार्रवाई कर सकते हैं।


बिना पक्षकार बने कोई भी संस्था राहत नहीं मांग सकती

इस बीच, प्रभावित निवासियों ने पहले सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया था, जहां से उन्हें हाई कोर्ट जाने की छूट दी गई। हालांकि तकनीकी कारणों से उनकी याचिका उसी दिन सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं हो सकी।

दूसरी ओर, नेशनल रियल एस्टेट डेवलपमेंट काउंसिल ने स्टे हटाने की मांग करते हुए दलील दी कि 2013 से लागू इस नीति के तहत पहले से स्वीकृत भवनों और निवेशकों को राहत मिलनी चाहिए। वरिष्ठ अधिवक्ता रणदीप सिंह राय ने कहा कि जिन इमारतों के नक्शे पहले ही पास हो चुके हैं या जो निर्माण पूरा कर चुकी हैं, उन्हें रोक के दायरे में नहीं लाया जाना चाहिए।

हालांकि हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना पक्षकार बने कोई भी संस्था राहत नहीं मांग सकती। अदालत ने याचिकाकर्ताओं को जवाब दाखिल करने का निर्देश देते हुए मामले की अगली सुनवाई पर इस मुद्दे पर विचार करने की बात कही।

इस आदेश के साथ ही अदालत ने यह भी संकेत दिया कि राज्य सरकार की व्यापक नीति अब भी न्यायिक समीक्षा के दायरे में रहेगी, जबकि अवैध निर्माण और अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई पर कोई रोक नहीं है।